आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

कविता: उठा कसम अब रण की भाग 2

                
                                                         
                            अब सहने का वह दौर गया, अब सिंहनी वन से जागेगी,
                                                                 
                            
जो आँख उठेगी हवस लिए, वह अपनी मौत को माँगेगी।
तुम समझ रहे थे मौन जिसे, वह ज्वालामुखी का लावा है,
अब न्याय करेगी खुद नारी, यह महाकाल का बुलावा है।

वो मोमबत्ती की राख नहीं, अब शोला बनकर भड़की है,
इंसाफ़ की खातिर आज गली, हर चौराहे पर कड़की है।
घूंघट के पीछे छुपने वाली, अब ढाल-तलवार उठाएगी,
जो छुएगा मैली नीयत से, वह लाश वहीं गिर जाएगी।

इतिहास गवाह है जब-जब भी, नारी ने रौद्र रूप धरा,
महिषासुर जैसे दानव का, पल में ही संहार करा।
अब बंद करो ये खोखले भाषण, अब संसद को भी सुनना होगा,
बेटियों की इस हिफाजत का, रास्ता तुमको ही चुनना होगा।

कानून की जो ये कछुआ चाल, अपराधियों को सह देती है,
हर तारीख पर रोती माँ, बस आँसू अपने पीती है।
अब तोड़ो इन अदालतों के, इस ठंडे पड़े निज़ामों को,
सड़कों पर ही अंजाम मिले, उन वहशी और गुलामों को।

ये नए भारत की नारी है, ये सहना अब भूल चुकी,
अन्याय के पिंजरे को तोड़, आकाश में ऊँचा झूल चुकी।
अब हाथ उठे तो याद रहे, कि बदला तुरंत ही आएगा,
जो लहू बहा था सड़कों पर, वो इंकलाब कहलाएगा।

- रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
9 hours ago

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर