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है कौन बड़ा नागरिक इस जग में, कोई तो दे हुंकार यहाँ!

Rohit Sharma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ये गगन चूमते महल नहीं, जन-जन के श्रम का शोषक हैं,
        
                                                    
                            
वैभव की भूखी वेदी के, ये हत्यारे और पोषक हैं।
ईंटों पर जिनके खून छपा, वो महलों से ठुकराए हैं,
अंधियारी काली रातों में, अपनी ही चिता जलाए हैं।

पहचान माँगते हाकिम जो, सत्ता के बंद कपाटों में
इंसान यहाँ कब सिमट सका, कागज़ के चंद लबातों में?
सदियों का गौरव धूल हुआ, फुटपाथों पर सम्मान गिरा,
अपनी ही पावन धरती पर, मानव बनकर अनजान फिरा।

जो सींच रहे थे मिट्टी को, वो आज अभागे सोते हैं,
औरों की तक़दीरें बुनकर, कोने में छुपकर रोते हैं।
पहचान नहीं, अधिकार नहीं, बस साँसों का व्यापार यहाँ,
है कौन बड़ा नागरिक इस जग में, कोई तो दे हुंकार यहाँ!

— रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'
एक घंटा पहले
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