आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

है कौन बड़ा नागरिक इस जग में, कोई तो दे हुंकार यहाँ!

                
                                                         
                            ये गगन चूमते महल नहीं, जन-जन के श्रम का शोषक हैं,
                                                                 
                            
वैभव की भूखी वेदी के, ये हत्यारे और पोषक हैं।
ईंटों पर जिनके खून छपा, वो महलों से ठुकराए हैं,
अंधियारी काली रातों में, अपनी ही चिता जलाए हैं।

पहचान माँगते हाकिम जो, सत्ता के बंद कपाटों में
इंसान यहाँ कब सिमट सका, कागज़ के चंद लबातों में?
सदियों का गौरव धूल हुआ, फुटपाथों पर सम्मान गिरा,
अपनी ही पावन धरती पर, मानव बनकर अनजान फिरा।

जो सींच रहे थे मिट्टी को, वो आज अभागे सोते हैं,
औरों की तक़दीरें बुनकर, कोने में छुपकर रोते हैं।
पहचान नहीं, अधिकार नहीं, बस साँसों का व्यापार यहाँ,
है कौन बड़ा नागरिक इस जग में, कोई तो दे हुंकार यहाँ!

— रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
53 मिनट पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर