जो मैं तेरे स्वप्नों में उतर जाऊँ,
नशा हो नज़र की, प्यास बन जाऊँ......
न ज़िगर, न रूह से अलग रहूँ,
तू संगीत मैं आवाज बन जाऊँ......
आभाओं की अरदास से उठा हूँ
पथ अविरल में, पथ-पड़ाव बन जाऊँ......
शून्य फ़िजा से, तम की महफ़िल तक,
ओ निशा, चाँदनी तू, मैं चाँद बन जाऊँ....
जब भी मेघों की कोलाहल हो,
तू बूँद लड़ी सी, मै बरसात हो जाऊँ.....-RISHIKESH.
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