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                            जो मैं तेरे स्वप्नों में उतर जाऊँ,
                                                                 
                            
नशा हो नज़र की, प्यास बन जाऊँ......

न ज़िगर, न रूह से अलग रहूँ,
तू संगीत मैं आवाज बन जाऊँ......

आभाओं की अरदास से उठा हूँ
पथ अविरल में, पथ-पड़ाव बन जाऊँ......

शून्य फ़िजा से, तम की महफ़िल तक,
ओ निशा, चाँदनी तू, मैं चाँद बन जाऊँ....

जब भी मेघों की कोलाहल हो,
तू बूँद लड़ी सी, मै बरसात हो जाऊँ.....-RISHIKESH.


- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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7 वर्ष पहले

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