हम पुष्प ही खिलकर कई मुरझा रहे हैं,
छविधाम तेरा अंस लेकर जा रहे हैं,
हम स्वप्न वाले, स्वप्न के औजार ले,
स्वर्ग तेरी ओर बढ़ते आ रहे हैं।
नहीं मालूम ये अद्भुत सृष्टि ज्ञेय किसको?
बनाने और गिराने का है जाता श्रेय किसको?
बड़ा दुर्जेय कार्य, भला उर में आसीन किसके?
नील परिधान आकाश का है वक्ष से रंगीन जिसके?
विदित करने धरा की सूक्ष्म इकाइयां इन,
उस व्योम से प्रतिपल टकरा रहे हैं,
हम स्वप्न वाले, स्वप्न के औजार ले,
स्वर्ग तेरी ओर बढ़ते आ रहे हैं।
अलंकृत विभा से धरा यह, सांध्य में जा समाता है,
छोड़ फिर भी न कोई विभा को, मनुजता पर इठलाता है,
हा ज्वालामई स्फुलिंग यह प्राण देखो, इतराओ,
मधुमुकुल विहाग से उठकर मानवों लड़ जाओ,
नर देह के ही करतबों से, कान्ति ले नवरस –
धरा पर, इतिहास लिखते जा रहे हैं,
हम स्वप्न वाले, स्वप्न के औजार ले,
स्वर्ग तेरी ओर बढ़ते आ रहे हैं।
– ऋषभ भट्ट