आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

स्वर्ग की ओर

                
                                                         
                            हम पुष्प ही खिलकर कई मुरझा रहे हैं,
                                                                 
                            
छविधाम तेरा अंस लेकर जा रहे हैं,
हम स्वप्न वाले, स्वप्न के औजार ले,
स्वर्ग तेरी ओर बढ़ते आ रहे हैं।

नहीं मालूम ये अद्भुत सृष्टि ज्ञेय किसको?
बनाने और गिराने का है जाता श्रेय किसको?
बड़ा दुर्जेय कार्य, भला उर में आसीन किसके?
नील परिधान आकाश का है वक्ष से रंगीन जिसके?

विदित करने धरा की सूक्ष्म इकाइयां इन,
उस व्योम से प्रतिपल टकरा रहे हैं,
हम स्वप्न वाले, स्वप्न के औजार ले,
स्वर्ग तेरी ओर बढ़ते आ रहे हैं।

अलंकृत विभा से धरा यह, सांध्य में जा समाता है,
छोड़ फिर भी न कोई विभा को, मनुजता पर इठलाता है,
हा ज्वालामई स्फुलिंग यह प्राण देखो, इतराओ,
मधुमुकुल विहाग से उठकर मानवों लड़ जाओ,

नर देह के ही करतबों से, कान्ति ले नवरस –
धरा पर, इतिहास लिखते जा रहे हैं,
हम स्वप्न वाले, स्वप्न के औजार ले,
स्वर्ग तेरी ओर बढ़ते आ रहे हैं।
– ऋषभ भट्ट
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
9 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर