मैं क्यूँ जिऊं हूँ सोचता,
दर्द भरके खुशियां बेचता,
रोशनी बनके जैसे हूँ अंधेरे में खड़ा,
इस नींद से दे जगा,
आ गले से मुझको लगा,
काफिला जगनुओं का जैसे भटका है बड़ा,
रात मद्धम और बुझी सी,
कहकशी बन गई है आजकल,
इश्क गहरे मौत सी,
ज़िंदगी बन गई है आजकल,
दिल बुलाता है मेरी जां,
कुछ खामोशियों में गुनगुना,
बेचैनियाँ खींच लाती,
रोशनी बन गई है आजकल,
इश्क गहरे मौत सी,
ज़िंदगी बन गई है आजकल।
परछाइयों को मेरे तूं डुबाकर,
आग दिल में कल लगाकर,
आज में, फिर किसी तेरी रौनक न मिली,
होंठ में ठहरी उदासी,
मुस्कान भूखी–प्यासी,
गुलशन में कह दूं कैसे, फूल महकी और खिली?
आशिकी में फिरती, पहचान
आवारगी बन गई है आजकल,
इश्क गहरे मौत सी,
ज़िंदगी बन गई है आजकल,
दिन–रात जो मैं तड़पूं,
खुद पे ही कितना झड़पूं,
जिस्म को गलाती, रूह
ठंडी पड़ गई है आजकल,
इश्क गहरे मौत सी,
ज़िंदगी बन गई है आजकल।
– ऋषभ भट्ट