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अपनी अस्मिता के समक्ष-- ,'प्रियवर का हाल और प्यार!'

Rikesh Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            उठ रही उस ओर उत्स से ,जीवन की अनुपम हाला
        
                                                    
                            
पीने वाले जा रहे हैं ,पाकर मरघट की ज्वाला।

जीवन में जो था पीयूष, सूख गया उसका आंगन
विदलित कर यह घन ,बरसाया फिर न सावन।

रसता में निरसता आई ,भक्ति तो पाखंड बना
जीवन में जो था ज्ञान, वह कल का घमंड बना।

नीरवता से पूर्ण चेतना, कैसे अरूणिमा को दे प्यार
जिसे ना हुआ कोई अन्य ,तो कैसे वह करें श्रृंगार ।

उस ओर से हो रही पुकार ,प्रिय! मैं आऊंगा पार
छोड़ जीवन की कलुषता ,आऊंगा प्रिय तुम्हारे द्वार।

पाकर तेरी करुणा की हाला, जीवन का उतरेगा भार
अपनी अस्मिता के समक्ष-- ,'प्रियवर का हाल और प्यार!'
एक घंटा पहले
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