ऑफिस में लोगो अब रावण जैसे दिखते हैं,
पर ब्रिटिश अंदाज़ में—
शांत, संयत, और भीतर से हल्की‑सी नाराज़गी लिए हुए।
जैसे बीबीसी का कोई एंकर कह रहा हो—
“स्थिति नियंत्रण में है… पर असल में नहीं है।”
एक चेहरा कहता—
“कंपनी पारदर्शिता के लिए प्रतिबद्ध है,”
दूसरा धीरे से जोड़ देता—
“हालाँकि वेतन संरचना पर टिप्पणी करना उचित नहीं होगा।”
तीसरा मुस्कुराकर बोलता—
“टीमवर्क हमारी ताकत है,”
और चौथा फाइलों के पीछे फुसफुसाता—
“क्रेडिट तो मेरा ही जाएगा, यह तो तय है।”
लोगो के चेहरे भी बड़े ब्रिटिश ढंग से बदलते हैं—
एक डायवर्सिटी वाला,
एक सस्टेनेबल वाला,
एक बराबरी वाला,
और एक ऐसा जो हर मीटिंग में बस यही कहता है—
“बस शांत रह के काम में लगे रहो,”
जबकि टारगेट की आग पीछे धधक रही होती है।
ऑफिस की राजनीति भी BBC‑टोन में चलती है—
सीधे नहीं बोलेंगे,
बस विनम्रता में लिपटा तंज छोड़ देंगे।
“आइडिया तो अच्छा लगा ”
मतलब—“इसे लागू करने का कोई इरादा नहीं है।”
“बाद में देखते हैं इसको ,”
मतलब—“कभी नहीं।”
कभी‑कभी लगता है,
अगर रावण लंदन आता,
तो बीबीसी पर इंटरव्यू में कहता—
“मेरे दस सिर काफी थे,
पर इन ऑफिस वालों के तो
हर घंटे नए चेहरे उग आते हैं—
और बिना किसी ब्रेकिंग न्यूज के।”
और अंत में—
लोगो, ऑफिस और राजनीति—
तीनों की यही ब्रिटिश कहानी है:
चेहरे जितने बढ़ते जाते हैं,
सच्चाई उतनी ही विनम्र रूप से
पृष्ठभूमि में गायब हो जाती है।..
-रमेश मेंदीरत्ता