नवनीत-कर में चंद्र छिपाए, नंद-द्वार मुसकाते हैं,
नील-वपु पर पीताम्बर की, विद्युत्-रेख सजाते हैं।
नूपुर की रुनझुन में जैसे, वेद-मंत्र झरते हैं,
नन्हे चरणों के स्पर्श से, त्रिभुवन स्वयं निखरते हैं।
माखन में माँ का मन पाकर, अधरों पर मुसकाते हैं,
मटकी फूटी तो अंतर के, बंद कपाट खुल जाते हैं।
दधि की श्वेत सुधा में जैसे, चंद्र-बिंब लहराता है,
कृष्ण-अधर जब वेणु धरें, शून्य स्वयं स्वर पाता है।
मैया की अँगुलि थामे चलते, त्रिभुवन-नाथ लजाते हैं,
गोकुल की धूलि माथे धरकर, देव स्वयं हरषाते हैं।
यशोदा की एक झिड़की पर, जगदीश्वर सिर झुकाते हैं,
ममता के सूक्ष्म सूत्रों में, अनंत स्वयं बँध जाते हैं।
कदंब-छाँह में बाँसुरिया की, मधुर सुधा बरसती है,
यमुना की नील लहरियों पर, चंद्र-रेखा हँसती है।
गोप-गृहों की निद्रा टूटे, ग्वाल-बाल मुसकाते हैं,
श्याम की बाँसुरी बजे, दिशि-दिशि प्राण जगाते हैं।
धेनु-नयनों में वात्सल्य के, उज्ज्वल दीप जलाते हैं,
बछड़ों की उछलती छाया में, बाल-सूर्य मुसकाते हैं।
मोर-पंख जब शीश सजे, नभ का मुकुट लजाता है,
श्याम-वपु पर मेघ उतरकर, प्रेम-सुधा बरसाता है।
माखन-चोर नयन उठाकर, जब मैया को भरमाते हैं,
तब निर्गुण के गूढ़ रहस्य भी, सगुण रूप धर जाते हैं।
जिसको योगी ध्यान न पाते, वह गोद में सो जाता है,
जिसे जगत् ‘परब्रह्म’ कहता, माँ का ‘लाला’ हो जाता है।
यही कृष्ण-लीला—जहाँ ब्रह्म, प्रेम के सम्मुख हार गया,
जहाँ अनंत माँ की गोद में, अपना विराट् भूल गया।
बालक की किलकारी में जब, ओंकार स्वयं झरता है,
यशोदा के आँचल में तब, सम्पूर्ण जगत् सँवरता है।
-सनातन मुकुंद