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कभी भागे थे हम भी जुगनुओं के पीछे

Rawat Rajni

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कभी भागे थे हम भी जुगनुओं के पीछे
        
                                                    
                            
कभी हमने भी घरौंदे मिटटी के बनायें थे
कभी ख्वाबों की दुनिया में जी के हम भी आये थे
कभी सब झूठ अच्छे थे जी भर हम भी मुसकुराये थे
कच्छी उम्र की बातें लगतीं हैं अब सच्ची
जहां बनाते थे रिश्ते खुले के निभायें थे
दुनिया की दहलीज पे रखे थे अब कदम
झूठी शानो-शौकत सारे अपने पराये है
वहीं मासूम सी गुज़री ज़िन्दगी याद बाक़ी है
ताउम्र गुजारी सांसों की मेरी बस इतनी कमाई है
4 घंटे पहले
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Updesh Kumar

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