कभी भागे थे हम भी जुगनुओं के पीछे
कभी हमने भी घरौंदे मिटटी के बनायें थे
कभी ख्वाबों की दुनिया में जी के हम भी आये थे
कभी सब झूठ अच्छे थे जी भर हम भी मुसकुराये थे
कच्छी उम्र की बातें लगतीं हैं अब सच्ची
जहां बनाते थे रिश्ते खुले के निभायें थे
दुनिया की दहलीज पे रखे थे अब कदम
झूठी शानो-शौकत सारे अपने पराये है
वहीं मासूम सी गुज़री ज़िन्दगी याद बाक़ी है
ताउम्र गुजारी सांसों की मेरी बस इतनी कमाई है
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