श्रीमान सम्पादक महोदय,
आपके इस प्रयास का मैं प्रशंसक हूँ. एक रचना पहले भी भेज चुका हूँ लेकिन स्थान नहीं मिला. ख़ैर कारण जो भी हों. मैं एक ब्लॉगर हूँ और "प्रिज़्म से निकले रंग" मेरा काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है. कभी-कभी विवेकाधिकार पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर सही फ़ैसले नहीं ले पाता है. पत्रकारिता जगत् को 1988 से भलीभांति जानता हूँ.
इसके बाद तीसरा प्रयास करके आपका क़ीमती समय ज़ाया नहीं करूंगा. दूसरी रचना भेज रहा हूँ. आपके मानदंडों पर खरी उतरे तो स्थान दीजियेगा अन्यथा मैं अपने विचार को कहीं और रखूँगा.
सधन्यवाद.
मूर्ति
सोचता हूँ
गढ़ दूँ
मैं भी अपनी
मिट्टी की मूर्ति,
ताकि होती रहे
मेरे अहंकारी-सुख की क्षतिपूर्ति।
मिट्टी-पानी का अनुपात
अभी तय नहीं हो पाया है,
कभी मिट्टी कम
तो कभी पर्याप्त पानी न मिल पाया है।
जिस दिन मिट्टी-पानी का
अनुपात तय हो जायेगा,
एक सुगढ़ निष्प्राण
शरीर उभर आयेगा।
कोई क़द्र-दां ख़रीदार भी होगा
रखेगा सहेजकर,
जहाँ पहुँचता न हो दम्भी हथौड़ा
मूर्तिभंजक नफ़रत का घूँट पीकर ..!
#रवीन्द्र सिंह यादव
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