विज्ञापन

गुज़रे हुए सालों की तरफ़...

Ravindra Singh

Mere Alfaz
विज्ञापन
                                    
                                                                        
                            गुज़रे हुए
        
                                                    
                            
सालों की तरफ़
दौड़ी है आज
थकी बेचैन नज़र
फ़िक़रे और तंज़ का
वो दौर
जिसमें नहीं था
कोई हम-सफ़र।

चाँद से माँगी थी
शबनम में भीगी
ठंडी चाँदनी
मगर सूरज
अड़ गया
दिखाने अपनी
शोलों-सी मर्दानगी।

धूप सहन न हुई
तो आये
पीपल के
घने साये में
हवा को न जाने
क्या हुआ
उड़ा ले गयी पत्ते
किसी के बहकाबे में।

शहर से
आया था गाँव
शुद्ध हवा की ख़ातिर
पेड़ काटे
ईंट-भट्टे में जला दिये
इंसान हो गया है
बड़ा शातिर।

चमन तक
साथ चले हम-नवा
बयाबान आया
तो किनारा कर गये
वक़्त के साथ
बदला है इंसान भी
वो पीठ पर वार
दोबारा कर गये।

रवीन्द्र सिंह यादव

हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
 
8 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Anil Kumar

4215 कविताएं

View Profile

Nema Ram

141 कविताएं

View Profile