जिन्दगी भी साला अपनी अजब ही बबाल हो गयी
हर कोई लतिया रहा इसे जैसे ये कोई फुटबाल हो गई,
माना है दोस्त जिसे हमने वो दुश्मनी निभा रहा है
जिसे अधिकार नही कोई, वो अधिकार जता रहा है
रिश्तेदार नही है जो वह रिश्तेदारी निभा रहा है
अपना है जो वो अपना होने पर ही शक जता रहा है
समझते हैं जिसको सगा वो हम पर ही गुर्रा रहा है
जिन्दगी भी अपनी ये अजब सबक दे रही है,
कुछ तोड़कर कुछ जोड़कर इम्तेहान ले रही है
कौन अपना कौन पराया हम भी उलझे पड़े हैं
न इधर न उधर बस दोराहे पर खड़े हैं
ये कैसी ये उलझन है कैसा ये खेल है
रिश्ते घसीट रहे यहाँ सब कैसे ये बेमेल हैं...