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कलम की खुदकुशी

Ravi Kumar Pandey

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मिरी दराज में वो माफ़ी का खत पड़ा ही रहा,
        
                                                    
                            
कलम की नोक से बस दर्द ही झड़ा ही रहा।

सोचा था लिखूँगा कि ख़ता क्या थी मेरी,
मगर हर लफ़्ज़ आईने की तरह डरा ही रहा।

वो तहरीरें जो कभी मरहम लगा सकती थीं,
उन्हीं के शोर से मेरा वजूद भरा ही रहा।

लिखते-लिखते ही बुझ गई आँखों की चमक,
हाथ काँपता रहा और रास्ता खड़ा ही रहा।
5 महीने पहले
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