मिरी दराज में वो माफ़ी का खत पड़ा ही रहा,
कलम की नोक से बस दर्द ही झड़ा ही रहा।
सोचा था लिखूँगा कि ख़ता क्या थी मेरी,
मगर हर लफ़्ज़ आईने की तरह डरा ही रहा।
वो तहरीरें जो कभी मरहम लगा सकती थीं,
उन्हीं के शोर से मेरा वजूद भरा ही रहा।
लिखते-लिखते ही बुझ गई आँखों की चमक,
हाथ काँपता रहा और रास्ता खड़ा ही रहा।
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