आदमी की फ़ितरत ही ऐसी है
आदमी सुख झेल नहीं पायेगा,
चाहे जितने सुख हो ज़िंदगी में
आदमी उन्हें संभाल न पायेगा।
करोड़ो का मालिक है अब भी
सुख का ख़ुद से मेल न पायेगा,
सुखों की सरहदें लांघ के दे दो
ख़ुद को अनुरूप ढाल न पायेगा।
भगवान बहुत बड़ा खिलाड़ी है
वो खेल आदमी खेल न पायेगा,
सुख का भंडार है भरा पड़ा है
दिल में बाद उजाला न पायेगा।
-रवी बैरु
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