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अन्तिम अभिलाषा

Ratneshwar Thakur

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मेरा मुल्तज़ा न करना,
        
                                                    
                            
जो मेरी साँसे बंद हो जाये,
दोजखे-आग की लपटों में,
मेरा निशाँ जब मिट रहा हो,
तुम एक मुस्कान देना,
थोड़ी नमी आंखों में लिए,
मेरे संग मेरे शब्दों की सौपान देना !

अक्षर- अक्षर जब मिट रहे हो,
मेरे यादों को भी मिटा देना,
वैसे भी मैं तुमको कुछ दे ना सका,
सिवाय, शिकवा शिकायत के,
तुम मेरा आखिरी सलाम लेना,
जब दोजखे-आग की लपटें अपनी शुमार पर हो,
मेरे संग मेरे शब्दों की तुम सौपान देना !

हो जो अश्रू मेरे नाम का,
उसको तुम संभाल लेना,
मेरे सांसो के संग,
जब में निष्प्राण होऊं,
हो स्थिर भाव मेरे चित को,
तुम एक मुस्कान देना,
जब दोजखे-आग की लपटें अपनी बेसुमार हो,
मेरे संग मेरे शब्दों की तुम सौपान देना !

हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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6 वर्ष पहले
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