आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

अन्तिम अभिलाषा

                
                                                         
                            मेरा मुल्तज़ा न करना,
                                                                 
                            
जो मेरी साँसे बंद हो जाये,
दोजखे-आग की लपटों में,
मेरा निशाँ जब मिट रहा हो,
तुम एक मुस्कान देना,
थोड़ी नमी आंखों में लिए,
मेरे संग मेरे शब्दों की सौपान देना !

अक्षर- अक्षर जब मिट रहे हो,
मेरे यादों को भी मिटा देना,
वैसे भी मैं तुमको कुछ दे ना सका,
सिवाय, शिकवा शिकायत के,
तुम मेरा आखिरी सलाम लेना,
जब दोजखे-आग की लपटें अपनी शुमार पर हो,
मेरे संग मेरे शब्दों की तुम सौपान देना !

हो जो अश्रू मेरे नाम का,
उसको तुम संभाल लेना,
मेरे सांसो के संग,
जब में निष्प्राण होऊं,
हो स्थिर भाव मेरे चित को,
तुम एक मुस्कान देना,
जब दोजखे-आग की लपटें अपनी बेसुमार हो,
मेरे संग मेरे शब्दों की तुम सौपान देना !

हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें
6 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर