खाँसती हूँ तो पानी देते हो,
बारिश हो तो छाता देते हो,
मुझे डाँटते तो भी ठीक था,
ये हक़ भी तुमसे छिन गया है…
तुम्हारी ये खामोशी मुझे बर्दाश्त नहीं हो रही है,
बताओ, मैं क्या करूँ,
तुमसे बात किए बगैर, ये साँस भी कहाँ पूरी हो रही है।
गलती मेरी हो तो सज़ा दे दो,
रूठी हूँ तो कोई वजह दे दो,
शिकवा है तो खुलकर कह दो,
चाहो तो मुझसे लड़ भी लो,
मगर यूँ चुप रहकर मुझे हर पल सज़ा मत दो,
तुम्हारी चुप्पी में जाने कितनी आवाज़ें हैं,
मैं किस-किस आवाज़ का जवाब दूँ, ये तो बता दो।
तुम्हारी आदत सी हो गई है,
हर बात तुम्हारी याद हो गई है,
तुम सामने नहीं होते हो तो भी,
तुमसे ही मेरी बात हो गई है,
अब ये दूरी किस नाम की है,
तुम ही बता दो…
ये कैसी खामोशी है,
क्योंकि तुम्हारी खामोशी से,
मेरी हर खुशी अनजान हो गई है,
बारिश आती है तो छत याद आती है,
ठंडी हवा चले तो तुम्हारी बात याद आती है,
दुनिया पूछती है… क्यों उदास हो,
उन्हें क्या पता,
तुम्हारी चुप्पी ही हर बार याद आती है।
बस इतना सा कर दो,
या तो फिर से डाँट दो,
या मेरा हाथ थाम लो,
मुझसे नाराज़ हो तो नाराज़गी बता दो,
मगर यूँ खामोश रहकर,
मेरे हिस्से की हर आवाज़ मत छीन लो।
तुम्हारे गुस्से में भी अपनापन था,
तुम्हारी डाँट में भी एक सहारा था,
अब जो कुछ नहीं कहते तुम,
यही तो सबसे बड़ा इशारा है…
कि शायद तुम्हें मेरी जरूरत नहीं,
और मुझे आज भी तुम्हारा इंतज़ार है।
तो बताओ, मैं क्या करूँ,
इस दिल को कैसे समझाऊँ,
तुम्हारी खामोशी को कैसे अपनाऊँ,
तुम बोलो तो मैं सारी उम्र सुन लूँ,
तुम रूठो तो उम्रभर मना लूँ,
बस यूँ चुप मत रहो…
वरना मैं खुद से ही,
तुम्हारा पता ना पूछती रह जाऊँ।
-रतन कुमार कैथवास