विज्ञापन

वक्त अगर दीवार उठाए, राह बदलनी पड़ती है

RATAN KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            दिल में उठते तूफ़ानों को,
        
                                                    
                            
हँसकर सहना पड़ता है,
अपने हिस्से के आँसू को,
ख़ुद में रखना पड़ता है।

मन की पीड़ा मन में रखकर,
चेहरे पर मुस्कान लिए,
कितने सपने दफ़्न किए हैं,
कितने झूठे अरमान लिए।
जब सपनों से दर्द मिले तो,
चुप ही रहना पड़ता है,
अपने ही विश्वास के ख़ातिर,
ख़ुद से लड़ना पड़ता है।

आँखों में बरसात ठहरी हो,
अधरों पर चुप्पी छाई हो,
मन के सूने आँगन में भी,
यादों की पुरवाई हो।
फिर भी जग के सम्मुख आकर,
जोर से हँसना पड़ता है,
भीतर चाहे टूट रहे हों,
बाहर बचना पड़ता है।

कुछ रिश्तों की ख़ातिर अक्सर,
सच ही कहना पड़ता है,
अपने मन की व्यथा छिपाकर,
सबको हँसाना पड़ता है।
जिसको अपना मान लिया हो,
उससे दूरी सहकर भी,
अपने दिल को लाख समझाकर,
चुप भी रहना पड़ता है।

वक़्त अगर दीवार उठाए,
राह बदलनी पड़ती है,
मन की सारी व्याकुलता को,
आग में जलना पड़ता है।
हर इच्छा पूरी हो, ऐसा,
कहाँ मुक़द्दर होता है,
कुछ पाने की चाहत में तो,
बहुत कुछ खोना पड़ता है।

रात अँधेरी कितनी भी हो,
दीप जलाना पड़ता है,
लाख निराशा घेर रही हो,
आश जगाना पड़ता है।
अपने हिस्से की लड़ाई,
स्वयं ही लड़नी पड़ती है,
गिरकर फिर उठने की ख़ातिर,
ज़ख़्म भुलाना पड़ता है।

नैन-जल ढरकना चाह रहे हों,
फिर भी संयम रखना है,
मन में चाहे लाख समंदर,
फिर भी ख़ुद में रहना है।
जीवन की इस कठिन डगर पर,
धैर्य ही साथी बनता है,
दुनिया से भी जीतेंगे हम,
अब ख़ुद भी लड़ना पड़ता है?
-रतन कुमार कैथवास
एक घंटा पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Rabindra Aman

122 कविताएं

View Profile