शीशों पर जमी रह जाती है धूल, वक़्त ठहर-सा जाता है,
बीते लम्हों का हर चेहरा, आँखों में उतर-सा जाता है।
आधी रात के बाद भी उसको, ढूँढ़ रहा हूँ गलियों में,
रेशमी कोहरा लिपटा बैठा, ख़ामोश पड़ी मंज़िलों में।
उम्मीद का दीपक अब तक, बुझने नहीं दिया जाता है।
कितनी रातें गुज़र गईं, कितने मौसम ढलते जाते हैं,
उसकी याद के रेशे अब भी, साँसों में उलझे हुए हैं।
दरवाज़ों पर आहट सुनकर, दिल जाने क्यों भर आता है,
हर गुज़रते साए में उसका, अक्स नज़र आ जाता है।
इंतज़ार का दर्द भी देखो, कितना अपना हो जाता है।
धुंध ने रास्ते ढक डाले, चाँद भी बादल में खोया है,
जिसको पाने की चाहत थी, उससे हर सपना रोया है।
फिर भी मन की चौखट पर मैं, आस लगाए बैठा हूँ,
उसके लौट आने की ख़ातिर, ख़ुद को समझाए बैठा हूँ।
दिल का रिश्ता टूटे कैसे, जब विश्वास न खोया है।
शीशे धुँधले पड़ जाएँ तो, चेहरा कहाँ दिखाई दे,
वक़्त अगर ख़ामोश रहे तो, किसको मौन सुनाई दे।
यादों की इस धुंध में लेकिन, उसकी सूरत साफ़ रही,
दुनिया चाहे भूल भी जाए, दिल में उसकी जगह वही।
कुछ मोहब्बतें वक़्त से आगे, अपनी उम्र बिताती हैं।
आधी रात के बाद भी मेरी, खोज अभी तक जारी है,
उसके मिलने की उम्मीद ही, जीवन की हिस्सेदारी है।
कल की सुबह न जाने किसका, कोई नया पैग़ाम लिखे,
किसी मोड़ पर मिल जाए वो, क़िस्मत ऐसा अंजाम लिखे।
मैंने आस नहीं छोड़ी है, बस मिलने की देर बाक़ी है।
-रतन कुमार कैथवास