तीर्थराज प्रयाग में तीन नदियों का संगम है,
गंगा की निर्मल धारा, यमुना का नील वर्ण है,
दिखती तो दो ही धाराएँ, तीसरी सरस्वती अदृश्य है,
फिर सवाल उठता है… यह विश्वास है या कोई प्रमाण है?
सरस्वती कूप खड़ा है सदियों की कहानी लेकर,
कितने ही युग बीत गए उसकी निशानी लेकर,
क्या कूप के अस्तित्व को ही नदी का प्रमाण मान लें,
या पुरखों की आस्था को इतिहास का बयान मान लें?
जो आँखों से दिखे वही सत्य हो… क्या इतना ही विधान है,
जो दिख न सके, उसके लिए कोई स्थान नहीं… क्या यही विज्ञान है?
कभी धरती के भीतर बहती धाराएँ भी तो अदृश्य होती हैं,
हर सत्य की गवाही क्या आँखों की मोहताज होती है?
सरस्वती का प्रश्न केवल नदी का प्रश्न नहीं है,
यह आस्था और तर्क के बीच खड़ा एक बारीक प्रश्न सही है,
कूप हमें परंपरा की एक ठोस निशानी तो देता है,
लेकिन अदृश्य धारा का होना… क्या केवल विश्वास ही कहता है?
प्रयाग का संगम इसलिए केवल जल का संगम नहीं,
यह विचारों, विश्वासों और इतिहास का भी संगम है कहीं,
सरस्वती दिखे या न दिखे, प्रश्न फिर भी जीवित रहेगा,
जहाँ प्रमाण समाप्त होगा, वहीं से विश्वास शायद जन्म लेगा।
हम न आस्था को अंधा करें, न तर्क को बेईमान कहें,
जो ज्ञात है उसे ज्ञात और जो अज्ञात है उसे अज्ञात कहें,
सरस्वती को मानने वालों की श्रद्धा का भी सम्मान हो,
और प्रमाण खोजने वालों के हाथ में भी खुला आसमान हो।
तीर्थराज प्रयाग की यही तो सबसे बड़ी पहचान है,
यहाँ हर धारा के साथ कोई न कोई पुराना अरमान है,
सरस्वती दिखाई न दे तो सवाल करना भी जायज़ है,
और उसे श्रद्धा से नमन करना भी इंसानी अंदाज़ है।
-रतन कुमार कैथवास