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शीशा ऐसा ढूंढ रहा वो

RATAN KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            शीशा ऐसा ढूँढ रहा वो, जो पत्थर को तोड़े,
        
                                                    
                            
शाम-सुबह वो मंथन करता, सोचे सौ-सौ बार।
टूटे तो फिर डरना कैसा, बिखरे तो क्या रोना,
दिल में जब कुछ करने की हो, क्यों रुक जाए विचार।

चोट मिले तो सीख समझकर, आगे बढ़ना चाहे,
हर ठोकर में राह तलाशे, हर मुश्किल को साधे।
लोग कहें ये नामुमकिन है, फिर भी मन ना माने,
जिसके भीतर आग हो बाकी, वो कब किससे हारे।

शीशा आखिर शीशा ही है, पत्थर कितना भारी,
लेकिन हिम्मत सामने हो तो, जीत उसी की प्यारी।
शाम-सुबह का ये मंथन ही, एक दिन रंग दिखाए,
सौ-सौ बार जो सोच चुका हो, वो एक ही बार कर जाए।
-रतन कुमार कैथवास
एक महीने पहले
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