बहुत उम्मीद थी सूरज के निकल आने की,
मगर ये रौशनी मुकद्दर के लिए सहर तो नहीं।
तमाम उम्र जिसे ख़्वाब में सँवारा था,
हक़ीक़तों में मिला वो वही घर तो नहीं।
बहुत दिनों से अँधेरों से लड़ रहे थे हम,
जो आज सामने है, वो उजाला मगर तो नहीं।
ज़माना कहता है अब सब बदल गया लेकिन,
जो दर्द साथ चला था, वो बेअसर तो नहीं।
हमारे हिस्से में आई है रौशनी फिर भी,
ये वही सुबह है जिसका था इंतज़ार… कभी |
अभी तो रात की स्याही बची हुई है कहीं,
उम्मीद कहती है शायद ये आख़िरी सहर तो नहीं।
-रतन कुमार कैथवास