बेशक बेशर्मी हो स्वार्थ के संग,
और मन में छल का हो ठिकाना,
मंदिर में जाकर एक दिया जलाना,
तब गंगाजल से पाप धुलाने,
यहाँ प्रायश्चित करने ज़रूर आना।
जब भूखे के हिस्से का अन्न खाओ,
और दान-पुण्य में नाम कमाओ,
जिसकी मेहनत से महल बने हों,
उसी को दरवाज़े से लौटाओ,
यहाँ प्रायश्चित करने ज़रूर आना।
जब न्याय की कुर्सी पर बैठकर,
अन्याय का लिखने लगो फ़साना,
जब सच को झूठों के हाथों बेचो,
और झूठ को सच बतलाना,
यहाँ प्रायश्चित करने ज़रूर आना।
जब माँ की आँखों में आँसू हों,
और बाप के सपने चूर हुए,
जब अपने ही अपनों के हाथों,
रिश्तों के सारे नूर लुटे,
यहाँ प्रायश्चित करने ज़रूर आना।
जब किसी ग़रीब की आह लगे,
और चैन से न कटे ज़माना,
जब कर्म तुम्हारे सामने आएँ,
और मुश्किल हो मुँह दिखलाना,
यहाँ प्रायश्चित करने ज़रूर आना।
मगर याद रहे, ऐ दुनिया वालो,
हर पाप का कोई हिसाब भी है,
मंदिर-मस्जिद में सिर झुकाने से,
बड़ा इंसान का व्यवहार भी है,
यहाँ प्रायश्चित करने ज़रूर आना।
पत्थर की मूरत क्या बोलेगी,
जब ज़िंदा इंसान करे पुकार,
भूखे को रोटी, दुखियारे को सहारा,
यही धर्म है, यही सच्चा उपहार।
यहाँ प्रायश्चित करने ज़रूर आना।
पहले अपने कर्म सुधारो,
फिर तीर्थों में शीश झुकाना,
जिसका हक़ छीना है तुमने,
पहले उसका हक़ लौटाना,
यहाँ प्रायश्चित करने ज़रूर आना।
ईश्वर को क्या भेंट चढ़ाओगे,
जब इंसान से ही की है बेईमानी?
पहले इंसानियत का फर्ज़ चुकाना,
नम आँखों का विश्वास जीत कर,
फिर यहाँ प्रायश्चित करने आना।
-रतन कुमार कैथवास