विज्ञापन

पड़ोसी का दर्द समझने की कोशिश ही नहीं की

RATAN KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            नए हथियार आए, नए मैदान हो गए,
        
                                                    
                            
कल के पैदल रास्ते, आज आसमान हो गए।
छतों के ऊपर से, गुज़रे हवाई जहाज़,
धरती पर फिर भी, वही भूख के अल्फ़ाज़।
तकनीक ने, दुनिया को रफ़्तार तो दी,
मगर दिलों के फ़ासले, कम क्यों हो गए।

नए ट्रांसमीटरों से, ख़बरें उड़ती रहीं,
पुरानी मूर्खताएँ, नए लिबास में पलती रहीं।
हर ज़ुबाँ ने दूसरे तक, अपना पैग़ाम पहुँचाया,
किसी ने झूठ फैलाया, किसी ने सच छुपाया।
बुद्धिमानी भी, मुँह-दर-मुँह चलती रही,
पर नफ़रत की आग भी, हर दौर में सुलगती रही।

नया गोश्त आज भी, पुराने काँटों से खाया जाता है,
नया ख़्वाब भी, पुराने ख़ौफ़ में दबाया जाता है।
मशीनें बदल गईं, मगर मिज़ाज वही रहा,
चेहरा नया हुआ, मगर अंदाज़ वही रहा।
हमने चाँद तक, पहुँचने का हुनर तो पा लिया,
मगर पड़ोसी का दर्द, समझने की कोशिश ही नहीं की।

नया ज़माना, केवल कैलेंडर बदलने से नहीं आता,
नया विचार, केवल नया नारा लगाने से नहीं आता।
जब पुरानी सोच की ज़ंजीरें टूटें, तब बदलाव आता है,
जब सच को मान मिले, तब नया समाज बन पाता है।
दादा से पोते तक यही सवाल रहेगा,
क्या वक़्त बदलेगा, या इंसान बदलता रहेगा?
-रतन कुमार कैथवास
एक दिन पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Dn Chaubey

7473 कविताएं

View Profile