तुम कहाँ तक मेरे साथ चलोगी,
घर नहीं जाना है क्या,
ये तुम्हें क्या हो गया है,
समय देखो ज़रा, रात होने को आई है,
तुम चाहो तो तुम्हारे घर तक छोड़ दूँ,
फिर इतनी दूर मेरे साथ आने की,
आख़िर क्या वजह है, बताओ ज़रा।
वो हँसकर बोली…
“घर तो जाना है, मगर अभी मन नहीं है,
तुम्हारे साथ चलने में जो सुकून है,
वो किसी और रास्ते में नहीं है।”
मैंने कहा… “लोग क्या कहेंगे?”
वो बोली… “लोगों का काम ही कहना है,
मुझे तो बस आज तुम्हारे साथ,
थोड़ा और चलना है।”
करणी माता मंदिर के पास,
हींग वाले पताशी खाना है |
मैंने फिर घड़ी की ओर इशारा किया,
“देखो, रात बहुत हो गई है,”
वो मुस्कुराकर बोली…
“रात तो रोज़ होती है,
आज बस तुम्हारे साथ होने वाली है।”
मैंने कहा… “चलो, तुम्हें घर छोड़ देता हूँ,”
वो बोली… “इतनी भी जल्दी क्या है,
अभी तो कुछ बातें बाकी हैं,
अभी तो एक गहरी बात बाकी है।”
मैंने पूछा… “कहाँ तक चलोगी मेरे साथ?”
वो चुप रही, बस मुस्कुराती रही,
शायद जवाब उसके होंठों पर था,
मगर आँखें कुछ और कह रहीं थी।
फिर मैंने कहा… “घर नहीं जाना है क्या?”
वो बोली… “जाना तो है,
मगर तुम्हारे साथ चलने की,
ये शाम अभी कहाँ ढली है।”
मैंने आख़िरी बार पूछा…
“तुम चाहो तो तुम्हारे घर तक छोड़ दूँ,”
वो धीरे से बोली…
“घर तक तो छोड़ दोगे,
मगर उसके बाद जो रिहाई मिलेगी,
उसका क्या करोगे…
वो भी साथ छोड़ दोगे क्या?”
-रतन कुमार कैथवास