विज्ञापन

लक्जरी अक्सर इंसान को, किताबों से दूर कर देती है

RATAN KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            एक लड़का था, जिसे ज़िंदगी में हर चीज़ आराम से चाहिए थी,
        
                                                    
                            
न किताबों की धूल पसंद थी, न मेहनत की धूप सहनी थी।
वह कहता था, जब दुनिया में इतने आराम के साधन हैं,
तो ख़ुद को तपाने की क्या ज़रूरत, जब तैयार इतने मुक़ाम हैं।

एक दिन उसके पिता उसे रसोई में ले गए,
चूल्हे पर रखे बर्तन के पास बैठाकर समझाने लगे।
बोले, बेटा… मक्खन को यूँ ही घी नहीं बनाया जाता,
बिना तपिश के किसी पदार्थ का असली रूप नहीं आता।

लड़के ने पूछा, क्या हर चीज़ को जलना ज़रूरी है?
पिता बोले, हर मंज़िल के पीछे तपना ज़रूरी है।
लक्ज़री अक्सर इंसान को, किताबों से दूर कर देती है,
आराम की आदत धीरे-धीरे, हौसलों को मजबूर कर देती है।

जिसने ठोकरें खाईं, वही रास्तों का जानकार हुआ,
जो धूप में चला, वही छाँव का हक़दार हुआ।
याद रखना, बेटा, मेहनत का कोई विकल्प नहीं होता,
जब तक मक्खन तपेगा नहीं, घी तैयार नहीं होता।

उस दिन लड़के ने आराम की चादर उतार दी,
अपने सपनों को मेहनत की नई धार दी।
समझ गया कि सुख बुरा नहीं, पर सुख का ग़ुलाम होना ठीक नहीं,
बिना संघर्ष के सफलता का ख़्वाब देखना कोई हक़ीक़त नहीं।

सीख यही है कि आराम करो, मगर आराम को आदत मत बनाओ,
किताबों से रिश्ता जोड़ो, अपने भीतर की आग जगाओ।
ज़िंदगी में कुछ बनने का इरादा अगर सच्चा होगा,
तो पसीने की हर बूँद से कामयाबी का नमक निकलेगा।
-रतन कुमार कैथवास
3 दिन पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Dn Chaubey

7573 कविताएं

View Profile