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कुछ अधूरी चाय के किस्से, कुछ बिछड़े हुए खयाल थे

RATAN KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कभी यहाँ विग्रहविहीन देव-मंदिर, ख़ामोशी से खड़ा था,
        
                                                    
                            
बगल में चाय की टपरी थी, जहाँ अपना सिलसिला बड़ा था।
दो प्यालों के बीच न जाने, कितनी बातें होती थीं,
चाय ठंडी हो जाती थी, पर मुलाक़ातें गर्म ही रहती थीं।
वक़्त गुज़र गया, मगर दिल वहीं कहीं पड़ा था।

बरसों बाद हाइवे से गुज़रा, तो मन मेरा भर आया,
बीते दिनों का एक मुसाफ़िर, यादों को साथ ले आया।
सोचा, चलकर देखूँ शायद, कुछ निशान मिल जाएँगे,
उसकी हँसी के बिखरे टुकड़े, उन राहों में मिल जाएँगे।
जिस जगह को भूल चुका था, दिल ने फिर वहीं बुलाया।

वही सड़क थी, वही मोड़ था, पर मंज़र बदला-बदला था,
जहाँ कभी हम मिलते थे, वहाँ सन्नाटा फैला था।
टपरी का वो छप्पर शायद, अब किसी और का ठिकाना था,
चाय की भाप में घुलता जो रिश्ता, अब बस एक फ़साना था।
हर परिचित-सी जगह पर, कोई अजनबी वक़्त खड़ा था।

मंदिर के उस सूने आँगन में, कुछ पल ठहरकर देखा,
दीवारों की चुप्पी में भी, बीते कल का चेहरा देखा।
न कोई आहट, न कोई ख़ुशबू, न तेरे आने की आस,
फिर भी दिल ने ढूँढ़ निकाली, तेरी यादों की मिठास।
पत्थरों के बीच भी जैसे, तेरा कोई निशाँ बचा था।

लौट चला तो साथ मेरे, कितने अनकहे सवाल चले,
कुछ अधूरी चाय के क़िस्से, कुछ बिछड़े हुए ख़याल चले।
वक़्त ने सब कुछ बदल दिया, पर दिल कहाँ बदल पाया,
जिस राह पर तेरा साथ मिला था, दिल फिर वहीं लौट आया।
कुछ जगहें नक़्शे पर नहीं, हमारी रूह में आबाद रहती हैं।
-रतन कुमार कैथवास
12 घंटे पहले
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