गीली मिट्टी की तरह हर बात पर हाँ-हाँ मत करो,
अपने वजूद को खोकर किसी की हाँ में हाँ मत भरो।
रीढ़ सीधी रखो अपनी, वक़्त के आगे अकड़ो,
अमरबेल की तरह मत जीओ, अपनी जड़ें ख़ुद पकड़ो।
यह दुनिया बदल रही है, तुम भी ख़ुद को बदलो।
दूसरों के सहारे कब तक अपनी हस्ती चलाओगे,
किसी और की डाल पकड़कर कब तक ऊँचाई पाओगे?
अपनी मिट्टी में उतरकर, अपनी पहचान गढ़ो,
आँधियों से आँख मिलाकर, अपने पैरों पर खड़े हो।
उधार की साँसें छोड़ो, अपने दम पर सँभलो।
जो कल था, आज वही हो… यह ज़िद भी कोई बात नहीं,
बदलते वक़्त को समझना, कमज़ोरी की सौग़ात नहीं।
जो सीखने से डरते हैं, वो पीछे छूट जाते हैं,
जो ख़ुद को तराशते हैं, वही इतिहास बनाते हैं।
नई सोच के औज़ारों से, अपने व्यक्तित्व को बदलो।
नर्म रहो तो फूलों जैसे, मगर कमज़ोर मत बनना,
झुको अगर तहज़ीब में, लेकिन मजबूरी में मत झुकना।
अपनी जड़ों में दम रखो, शाख़ों को विस्तार दो,
सच के लिए आवाज़ उठाओ, मेहनत को आकार दो।
स्वाभिमान की मिट्टी में अपने उसूलों को बदलो नहीं।
यह दुनिया ठहरी नहीं है, हर दिन नया सवाल है,
कल का जो सिकंदर था, आज वक़्त का मोहताज है।
नए विचारों को अपनाओ, पुराने भ्रमों से निकलो,
अपनी जड़ें मज़बूत रखो, मगर नई दिशाओं में चलो।
दुनिया बदल रही है… वक़्त के साथ ख़ुद को बदलो।
-रतन कुमार कैथवास