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जिंदगी दर्द का मरहम हो, तो गज़ल होती है

RATAN KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कभी अपनों की बेरुख़ी, कभी ग़ैरों के सवाल,
        
                                                    
                            
दिल पे हर रोज़ नया ज़ख़्म हो, तो ग़ज़ल होती है।

कभी आँखों में नमी हो, कभी लब पर हो हँसी,
दर्द सीने में जो कम हो, तो ग़ज़ल होती है।

कभी उम्मीद के दीपक, कभी तूफ़ान की रात,
राह मुश्किल का क़दम हो, तो ग़ज़ल होती है।

कभी ख़ामोश निगाहें भी कहें सारी दास्ताँ,
लफ़्ज़ कम हों, मगर ग़म हो, तो ग़ज़ल होती है।

कभी टूटे हुए ख़्वाबों से सजें दिल के मक़ाम,
ज़िंदगी दर्द का मरहम हो, तो ग़ज़ल होती है।
-रतन कुमार कैथवास
15 घंटे पहले
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