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जरा मिट्टी की तपिश को, टटोलकर देखिए

RATAN KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            शहर में कोई नया निज़ाम आया है क्या,
        
                                                    
                            
हर तरफ़ धूल का ये गुबार छाया है क्या?
राह चलते हुए चेहरों पे ख़ौफ़ देखा है,
किसी ने सच को सरेआम दफ़नाया है क्या?
ये जो ख़ामोश हैं गलियाँ, ये जो वीरान समाँ,
किसी तूफ़ान ने आने का पैग़ाम सुनाया है क्या?

रिश्तों की बानगी अब बाज़ार में नहीं देखी,
दिलों में पहले-सी वो दरियादिली नहीं देखी।
लबों पे प्यार था, आँखों में अजनबियत मिली,
किसी की आँख में अब आँख की नमी नहीं देखी।
जो अपने थे, वही दीवार बनकर खड़े मिले,
किसी भी रिश्तों में सच्चाई की लौ नहीं देखी।

दरमियाँ आँखों में सुलगते अंगार तो नहीं देखे,
मुस्कुराहटों के पीछे कोई वार तो नहीं देखे?
इतनी ख़ामोशी भी अच्छे दिनों की निशानी नहीं,
कहीं सब्र के टूटने के आसार तो नहीं देखे?
जो हर सवाल पर पहरे बिठाए जाते हैं,
उनकी आँखों में हार के इकरार तो नहीं देखे?

कुछ नहीं तो हवा का रुख़ मोड़कर देखिए,
बंद खिड़कियों से बाहर झाँककर देखिए।
धुआँ उठता है जहाँ, आग भी होती है कहीं,
ज़रा मिट्टी की तपिश को, टटोलकर देखिए।
हर चिंगारी को पैरों से कुचलना ठीक नहीं,
पहले शोले की वजह पूछकर देखिए।

ये जो सन्नाटा है, इसे शांति न मानिए,
हर झुके हुए सिर को सहमति न जानिए।
दावानल के आसार हों तो पेड़ों से पूछिए,
हर सूखे हुए पत्ते को बेबसी न मानिए।
निज़ाम वही जो दर्द को समझने का हुनर रखे,
सिर्फ़ धूल हटाने को शहर की सफ़ाई न मानिए।
-रतन कुमार कैथवास
11 घंटे पहले
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