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इस बार नहीं आ पाया

RATAN KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            सरे राह उसकी आँखें मुझे ही ढूँढ रही थीं,
        
                                                    
                            
मैं उस दिवाली घर आ न सका था,
दीयों की कतारें तो खूब सजी थीं आँगन में,
बस एक दिया उसके मन का बुझा था।

दरवाज़े की हर आहट पर,
वो जाने कितनी बार उठी होगी,
किसी राहगीर के कदमों में,
शायद मेरी आहट सुनती रही होगी।

माँ ने पूछा होगा… “आएगा ना इस बार?”
वो हँसकर शायद टाल गई होगी,
मेरी मजबूरी का बहाना बनाकर,
सबसे मेरी गैरहाज़िरी छिपा गई होगी।

शहर में, मैं भी दीये जलाता रहा,
मगर घर की रोशनी याद आती रही,
पटाखों के शोर में भी जाने क्यों,
उसकी खामोशी सुनाई देती रही।

कितना आसान था कहना… “बस इस बार नहीं आ पाया,”
मगर दिल ये बात कहाँ मानता था,
वो सरे राह मुझे ढूँढ रही थी,
और मैं उसी राह से दूर चला जाता था।

दिवाली तो हर साल आती रही,
मगर वो इंतज़ार फिर कहाँ आया,
एक बार जो आँखों में ठहर गया इंतज़ार,
वो फिर किसी त्योहार में नज़र नहीं आया।

आज भी जब दीये जलते हैं,
मन जाने क्यों उदास हो जाता है,
घर लौटने की चाह तो बहुत है,
बस वो पुराना इंतज़ार कहाँ से लाऊँ…
जो मेरी राह तकते-तकते,
खुद ही कहीं खो जाता है।
-रतन कुमार कैथवास
एक महीने पहले
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