विज्ञापन

हक की आवाज

RATAN KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जंजीरें क्यों खोल रहे हो, मुझसे मेरा सफ़र न छीनो,
        
                                                    
                            
अभी तो राह में काँटे हैं, मुझसे मेरा हुनर न छीनो।

उस बच्चे की आँखों में एक बार झाँककर तो देखो,
फिर पूछो मुझसे, कहो… क्या मैं ग़लत राह पर हूँ?

किसी बेबस को उसका हक़ दिलाना अगर जुर्म है,
तो बताओ फिर ये इंसाफ़ की आवाज़ किसके नाम है?

मैं लड़ रहा हूँ किसी कुर्सी, किसी ताज के लिए नहीं,
मैं खड़ा हूँ उस चेहरे के लिए जिसे मिला न्याय नहीं।

मेरे हाथों में हथियार नहीं, बस सच का उजाला है,
मेरी ज़िद में किसी अपने का बेहतर कल निराला है।

तुम रोक सकते हो मेरे क़दम, मगर इरादे कहाँ रोक पाओगे,
जितनी जंजीरें बाँधोगे, उतने ही सवाल पाओगे।

'रतन', अगर हक़ की आवाज़ उठाना गुनाह है,
तो फिर ये गुनाह भी हम बार-बार करते रहेंगे।
-रतन कुमार कैथवास
एक घंटा पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Ankit Kumar

10784 कविताएं

View Profile

Chitra Panwar

31 कविताएं

View Profile

Anil Pandey

461 कविताएं

View Profile

Ipsita Bhadauria

37 कविताएं

View Profile

Sanjai kumar

127 कविताएं

View Profile