दिल धरती, मेरी माटी सोना,
दूर गगन से छाँव आ रही,
लेकर चंदन की खुशबू का,
कैसे उसको संगीत सुनाऊँ,
मन में कोई गीत जगाऊँ।
पवन सुनाती कथा पुरानी,
नदिया गाती अमर कहानी,
पत्तों की सरगम पर झूमूँ,
या बादल की तान मिलाऊँ,
मन में कोई गीत जगाऊँ।
भोर सुनहरी द्वार खड़ी है,
ओस धरा के गालों पर है,
किरण-किरण में प्रेम भरा है,
रंग खिले हर डाली पर हैं।
इस उजियारे की वीणा पर,
कौन-सा मधुरिम राग सजाऊँ,
मन में कोई गीत जगाऊँ।
खेतों में लहराती फसलें,
माटी में विश्वास पल रहा,
मेहनत की पावन गंधों से,
जीवन का इतिहास ढल रहा।
हल की रेखाओं में लिखकर,
श्रम का गौरव जग को गाऊँ,
मन में कोई गीत जगाऊँ।
नीम तले बैठी दोपहरी,
पीपल गाता छाँव के गीत,
चिड़ियों की चहकारों में है,
जैसे कोई अनहद प्रीत।
इन स्वर लहरियों को चुनकर,
शब्दों की एक माला बनाऊँ,
मन में कोई गीत जगाऊँ।
दूर क्षितिज पर साँझ उतरती,
रंग सुनहरे घुलते जाएँ,
थके पथिक के मौन अधर पर,
आशा के स्वर खिलते जाएँ।
दिनभर की थकान समेटे,
सपनों का संसार बसाऊँ,
मन में कोई गीत जगाऊँ।
माटी के कण-कण में जैसे,
पूर्वजों की सौगंध बसी है,
नदियों की हर एक लहर में,
जीवन की आनंद-हँसी है।
इस धरती के ऋण को लेकर,
कैसे ना अपना शीश झुकाऊँ,
मन में कोई गीत जगाऊँ।
दिल धरती है, प्रेम गगन है,
भावों की अविरल धारा,
शब्द भले ही मौन खड़े हों,
संगीत बने मन सारा।
प्रकृति स्वयं जब छंद सुनाए,
मैं भी अपना स्वर मिलाऊँ,
चंदन माथे पर सजाकर,
मन में कोई गीत जगाऊँ।
-रतन कुमार कैथवास