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अनाप-शनाप बकते देखा

Ramjeet pal

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कभी पीठ पीछे तो कभी सच के सामने झूठ को अनाप-शनाप बकते देखा,
        
                                                    
                            
और कभी पीठ पीछे तो कभी सच के सामने झूठ को थिरकते देखा,
किंतु दबाने के लाख कोशिश के बाद भी सच इश्क की जिस महफिल में खोला मुंह,
सचमुच ठीक उसी इश्क की महफिल में झूठ को अपने से अपना मुंह ढकते देखा|
-मनस्व
एक महीने पहले
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