कभी पीठ पीछे तो कभी सच के सामने झूठ को अनाप-शनाप बकते देखा,
और कभी पीठ पीछे तो कभी सच के सामने झूठ को थिरकते देखा,
किंतु दबाने के लाख कोशिश के बाद भी सच इश्क की जिस महफिल में खोला मुंह,
सचमुच ठीक उसी इश्क की महफिल में झूठ को अपने से अपना मुंह ढकते देखा|
-मनस्व
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