बया की बयाँ
चिड़िया प्यारी बया हमारी!
रंग है तेरा प्यारा कितना?
काम करे तू मेहनत का उतना,
कार्य देख तेरा बलि-बलि जाऊँ,
श्रम करना मैं तुमसे पाऊँ,
चिड़िया प्यारी बया हमारी!
महल बना तरु की डाली पर,
कितना सुंदर है तेरा घर,
तिनके से तुम उसे बनाती,
जुगुनू का तुम बल्ब लगाती,
चिड़िया प्यारी बया हमारी!
मिलकर तुम सब करते काम,
मिल पाता कम ही आराम,
दाना लाती पानी लाती,
बच्चों का तब पालन कर पाती,
चिड़िया प्यारी बया हमारी!
दादी- नानी कहें कहानी,
चिड़िया है मेरी बया रानी,
अब तो तेरा महल ना दिखता,
बातों से बस दिल मैं सिंचता,
चिड़िया प्यारी बया हमारी!
बदल गया पूरा परिवेश,
क्या तुम भी छोड़ गई मेरा देश?
कैसे मैं उनको बतलाऊँ?
इंटरनेट में बस चित्र दिखाऊँ,
चिड़िया प्यारी बया हमारी!
रमेश सिंह यादव "प्रकृतप्रेमी"
- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें