मुक्तक विन्यास में तेवरी
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आजकल मौसम है प्रतिकूल
डाल पर एक नहीं है फूल |
दीखता घना तिमिर हर ओर
व्यवस्था बदल गयी आमूल ||
उड़े अब सिर्फ धूल ही धूल
खड़े हैं चारों ओर बबूल |
कहाँ से लायें पुष्प-सुगंध
हमारे हिस्से आये शूल ||
हिलीं जीवन की सारी चूल
हवाई निकला हर स्थूल |
ज़िन्दगी-भर का दुष्परिणाम
करी थी बस थोड़ी-सी भूल ||
-रमेशराज