रोना तो पीड़ा का पहला पड़ाव है,
मौन उसकी अंतिम पराकाष्ठा।
आँसू तब तक बोलते हैं,
जब तक मन में बची होती है ,
किसी के समझने की आशा।
जब शब्द भी घाव बन जाएँ,
जब सिसकियाँ भीतर ही दफन हो जाएँ,
जब आँखें बरसना छोड़ दें और,
होंठ मुस्कराना सीख जाएँ—
समझना, पीड़ा ने मौन की चादर ओढ़ ली है।
हर खामोश चेहरा शांत नहीं होता,
हर नीरव हृदय विरक्त नहीं होता।
कुछ लोग इसलिए नहीं रोते कि
उनका दुःख कम हो गया है,
वे इसलिए चुप हैं क्योंकि अब उन्हें अपने दर्द के भी अनसुने रहने का यकीन हो गया है।
रोना पीड़ा की अभिव्यक्ति है,
मौन पीड़ा का अवशेष;
और जब दर्द शब्दों से बड़ा हो जाए,
तब खामोशी ही लिखती है
मनुष्य के टूटने का विशेष।