आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

पीड़ा का अंतिम छोर

                
                                                         
                            रोना तो पीड़ा का पहला पड़ाव है,
                                                                 
                            
मौन उसकी अंतिम पराकाष्ठा।
आँसू तब तक बोलते हैं,
जब तक मन में बची होती है ,
किसी के समझने की आशा।

जब शब्द भी घाव बन जाएँ,
जब सिसकियाँ भीतर ही दफन हो जाएँ,
जब आँखें बरसना छोड़ दें और,
होंठ मुस्कराना सीख जाएँ—
समझना, पीड़ा ने मौन की चादर ओढ़ ली है।

हर खामोश चेहरा शांत नहीं होता,
हर नीरव हृदय विरक्त नहीं होता।
कुछ लोग इसलिए नहीं रोते कि
उनका दुःख कम हो गया है,
वे इसलिए चुप हैं क्योंकि अब उन्हें अपने दर्द के भी अनसुने रहने का यकीन हो गया है।

रोना पीड़ा की अभिव्यक्ति है,
मौन पीड़ा का अवशेष;
और जब दर्द शब्दों से बड़ा हो जाए,
तब खामोशी ही लिखती है
मनुष्य के टूटने का विशेष।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर