विज्ञापन

यह साँझ को क्या हो जाता है

Ramanand Yadav

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            यह साँझ को क्या हो जाता है , क्या दिन नहीं छोड़ा जाता है , बात ऐसी भी नहीं कि, सिर्फ आज ही आज है , कल नहीं फिर होना साँझ है , काज अधूरे तो क्या हुआ , बात ऐसी भी तो नहीं , कि अब खत्म काज की मियाद है ,
        
                                                    
                            


हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें। 
6 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

N manglam

371 कविताएं

View Profile

Javahir Kumar

2 कविताएं

View Profile

Deepti Tripathi

109 कविताएं

View Profile

Deepak Dubey

2 कविताएं

View Profile

Gurdeep Singh

143 कविताएं

View Profile

Anita Chaturvedi

181 कविताएं

View Profile

Muntazir Firozabadi

7 कविताएं

View Profile