यह साँझ को क्या हो जाता है , क्या दिन नहीं छोड़ा जाता है , बात ऐसी भी नहीं कि, सिर्फ आज ही आज है , कल नहीं फिर होना साँझ है , काज अधूरे तो क्या हुआ , बात ऐसी भी तो नहीं , कि अब खत्म काज की मियाद है ,
हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।