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मैं और तुम

Rama Sharma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मैं और तुम
        
                                                    
                            
शायद कभी हम हुए ही नहीं
मेरी ही नज़रों का धोखा रहा
या मेरा अंधा मोह रहा ये।

मैं
झूठ को सच मान कर जीती रही
खुशी- खुशी
अपनी जिंदगी बिताती रही
बिना किसी शक, ग़म या दर्द के
तुमने जो कहा
आँखें मूँद कर विश्वास करती रही
मानती रही
आत्मसात् करती रही
तुम्हारी हर बात मेरे लिए
शाश्वत सत्य बन जाती थी

मेरे आसपास
तुम जो भी भ्रम फैलाते रहे
मैं उसी भ्रम को
अपने अंतर में उतारती रही
आँखें खोलकर
कभी सच को देखने या परखने का
ख़्याल तक नहीं आया मुझे
कभी सोच ही नहीं पाई कि
अपनी आँखों से देखूँ
अपने मन की सुनूँ

तुम जो कहते गए
जो रास्ता दिखाते गए
मैं गांधारी की तरह
आँखों पर पट्टी बाँधें
उसी का अनुसरण करती गई

धीरे-धीरे मैं गांधारी के साथ- साथ
धृतराष्ट्र भी बन गई
तुम्हारा मोह
मुझे अंधा और बहरा बनाता गया
मुझे वैसे ही चलना अच्छा लगता
जैसा तुम कहते

मैंने आँखें खोल कर कभी
सत्य को देखना ही नहीं चाहा
तुम्हारा झूठ
मुझे कभी झूठ लगा ही नहीं
मैं उसे ही
परम सत्य मान कर पूजती रही
सच मानो !
तुम्हारा सच जानने की या परखने की
इच्छा ही नहीं हुई कभी

कभी किसी ने अगर
मेरी आँखों से पट्टी खोलने की कोशिश भी की
तो मुझे
क़तई गवारा नहीं हुआ
आँखों से पट्टी के खुलने पर
सत्य की चकाचौंध
मुझे मन ही मन डराती थी
मैं ..!
सत्य की रौशनी को झूठ का अंधकार समझ
पट्टी और कस कर बांध लेती
और फिर से चलने लगती
तुम्हारे पीछे
मुस्कुराते हुए
गहरी नदी सी शांत बहती रही सदा
तुम्हारे पीछे
तुम्हारे दिखाये रास्ते पर

अचानक एक दिन…..
बिलकुल अचानक !!!
खाई में जा गिरी तो !
कुछ समझ ही नहीं आया
बहुत समय लग गया मुझे
ये जानने और समझने में
कि मैं झूठ के भ्रमजाल को
सत्य की रौशनी मान रही थी
मैं तपते रेगिस्तान में
जल की कल्पना कर रही थी
एक मृग मरीचिका के पीछे भाग रही थी
मैं गहरी काली रात को
उजला सवेरा समझ रही थी
झूठ और फरेब को
सत्य का अमृत मान कर जीवन जी रही थी
परन्तु वहाँ सत्य कहाँ था ?
वहाँ तो था
एक गहरा काला झूठ
बहुत ही भयावह और बदबूदार झूठ
जो अब मुझे सहन करना था
मानना था
आत्मसात् करना था
अब कोई नहीं था
मुझे रास्ता दिखाने के लिये

मुझे अब
रौशनी और अँधेरे में
अंतर स्वयं ही करना था
सही और गलत को
खुद ही परिभाषित करना था
कसौटी कड़ी थी !
दुखदाई थी !
पीड़ा से भरी हुई थी !

परन्तु अब मुझे
हर कसौटी पर खरा उतरना था
मैं डूब नहीं सकती थी
झूठ और फरेब के अँधेरों में खो नहीं सकती थी

अब मुझे तलाशना था
अपना सत्य
तुम्हारा सत्य
हमारा सत्य
मुझे ही इनका अंतर समझना था
अब मुझे
गांधारी और धृतराष्ट्र नहीं
अर्जुन बनना था
अब मैं अपना निशाना और
अपने ध्येय से
चूक नहीं सकती थी
अब मुझे अपना रास्ता
स्वंय बनाना था
हम के भ्रमजाल से निकल कर
मैं और तुम की पहचान करनी थी
अपने को मथ कर
तुम्हारा असत्य और अपना सत्य
दोनों की खरी पहचान करनी थी
विष और अमृत को अलग करना था
तुम्हें तुम्हारा अमृत दे कर
जीवन की कड़वी सच्चाइयों का विष
अब मुझे पीना था
आत्मसात् करना था

मुझे…..
स्वयं ही अपने हाथों
अपने दिल को काट कर
अपने से अलग करना था !
और……
मैंने कर दिया !!!!
मैंने भ्रमजाल तोड़ दिया
मैंने सत्य की तीखी धूप में
अपनी आँखें खोल ली
मैंने अपने हर डर को
अपने ही हाथों
बेदर्दी से कत्ल कर दिया
अपनी आत्मा को पा लिया
मैं और तुम की पहचान कर ली
स्वंय को स्वयं से जीत लिया
- रमा पूर्णिमा शर्मा
 
9 महीने पहले
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