कितना भी वार कर
कितना भी प्रहार कर
पराभव ना होगा कभी
क्षयभय ना हुआ कभी
तू निरस्त कर परस्त कर
तू भंग कर तंग कर
वैभव ना मिटेगा कभी
वर्चस्व ना झुकेगा कभी
तू हर हाल में उपहास कर
तू व्यंग्य कर परिहास कर
शीश मुकुट ना झुकेगा कभी
वीर शस्त्र ना रुकेगा कभी
तू पाँच गाँव न दे भला
तू सारे दाँव चल भला
उद्देश्य लक्ष्य का ना मुड़ेगा कभी
घोषित युद्ध अधर्म का ना रुकेगा कभी
तू मार्ग में रूकावटे बिछा
तू जालसाज के क्रम सजा
राह पथिक ना भटकेगा कभी
जीवन रथ ना रुकेगा कभी
-राकेश रंजन