आज हिमालय सिमट रहा है
दुनिया का ताज बिखर रहा है
हमनशीं थे उसके ग्लेशियर्स
आज उनका साथ छूट रहा है
जो आसमाँ को बुलंद कर रहा था
वो रहनुमा ज़मीं पर गिर रहा है
पत्थरों में दिखता है ख़ौफ़ का सवेरा
ये सवेरा, अँधेरा बनकर बह रहा है
नहीं हैं देवदार, नीला आसमाँ कैसे झुक रहा है
नहीं है रोशनी, पूरब का तारा कैसे चमक रहा है
II
वो बचपन का आँगन कैसे डूब गया
वो आँखों का आब कैसे सूख गया
‘पासबाँ वो हमारा’ हमसे रूठ गया
‘संतरी वो हमारा’ पीछे छूट गया
जन्नत का दरिया कैसे टूट गया
मानो दिल का तारा कहीं दूर गया
रोशनी का गागर कैसे फूट गया
क़ुदरत का आईना कैसे रूठ गया
जो कुछ देखा-जाना था, वो दूर गया
जो कुछ अवचेतन था, वो भी भूल गया
III
जो खो गए, उन्हें चिराग़ की तरह जलना होगा
इन वीरानों में भी, उन उजालों को महकना होगा
दुनिया के शिखर को ज़मीं से उठना होगा
हिमालय के मोतियों को फिर चमकना होगा
ज़र्रे ज़र्रे में ज़िंदगी को खिलना होगा
नेपाल को दुनिया का आईना बनना होगा
इस सरज़मीं को हर सपने का हिसाब रखना होगा
सदियों से सँजोई मिट्टी से नए घर आबाद करना होगा
जब बहार आए, इक नए सफ़र को अंजाम देना होगा
सर्द रातें हों आज, सुबह झीलों में कमल खिलना होगा