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पत्तों की सरसर ध्वनि सुनें,

Rajeshwari Joshi

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            शब्द नहीं चाहते केवल
        
                                                    
                            
किताबों में बँधकर रहना,
चाहते हैं पंछी बनकर
नीले नभ में दूर उड़ना।

शब्द बनना चाहते हैं
माटी की सौंधी मुस्कान,
तपती धूप में खेतों पर
झुकते श्रम का मधुर गान।

हल की रेखाओं में लिखना
धरती का उजला इतिहास,
बीजों की नन्ही आँखों में
भर देना जीवन का विश्वास।

शब्द बनना चाहते हैं
उन बच्चों के आशा-दीप,
जो दिनभर कूड़ा बीनते,
रात पढ़ें सपनों के गीत।

धूल सने जिन हाथों में भी
कल का सूरज पलता है,
टूटी पट्टी, फटे बस्ते में
ज्ञान-कमल फिर खिलता है।

शब्द बनना चाहते हैं
उनकी आँखों का उजियारा,
जिनके हिस्से धूप अधिक है,
कम है छत का एक सहारा।

शब्द बनना चाहते हैं
उन नन्हे जीवन की लोरी,
जिनके ऊपर खुला गगन है,
धरती जिनकी माँ है भोली।

उनके सूने स्वप्नों में
चाँद उतरकर बात करे,
नींद की कोमल पलकों पर
आशा कोई प्रभात धरे।

शब्द बनना चाहते हैं
सीमा के प्रहरी के गीत,
हिम-शिखरों की ठंडी रातों में
उनके मन के बने मीत।

जब घर से दूर खड़ा सैनिक
देखे तारों भरा आकाश,
शब्द बनें माँ की ममता,
शब्द बनें घर का विश्वास।

शब्द बनना चाहते हैं
गाँव की श्रममयी नारियों का स्वर,
जो सिर पर लकड़ी, घास उठाकर
चलती हैं पथरीली डगर।

उनके श्रम की हर आहट में
सृजन-धरा का गान रहे,
उनकी मौन हथेलियों में
एक सुनहरा भोर रहे।

शब्द बनना चाहते हैं
बंजारे की बाँसुरी की तान,
दुख की धूल भरी राहों में
जगा सकें मधुमय मुस्कान।

किसी अकेले मन के भीतर
बन जाएँ हम मौन संवाद,
सूनी आँखों में भर दें फिर
जीने का कोमल विश्वास।

शब्द उतरना चाहते हैं
हर खेत और हर खलिहान,
फूलों की पंखुड़ियों से पूछें
कैसे खिलता है मुस्कान।

पत्तों की सरसर ध्वनि सुनें,
नदियों से कुछ सीखें बात,
पर्वत से धैर्य माँग लें और
बादल से बरसाती रात।

शब्द बनें वन की हरियाली,
शब्द बनें झरने की रुनझुन,
शब्द बनें उषा की लाली,
शब्द बनें पवन की धुन।
एक दिन पहले
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