मेरे अल्फाज
सावन की देहरी
सावन आया तो किवाड़ ने
बिना हवा के साँस ली,
भीतर रखी धूप ने जैसे
अपनी जगह बदल ली।
बरामदे की एक कील पर
फीका धागा झूल रहा था,
उसमें जाने कितने मौसमों का
एक सिरा उलझा था।
नीम की छाल पर खिंची लकीरें
अब भी कुछ कहती थीं,
सबसे ऊपर वाली लकीर पर
उँगलियाँ ठहर गईं।
चूल्हे की ठंडी राख कुरेदी—
नीचे हल्की गर्मी थी,
जैसे किसी बीती दोपहर ने
राख में साँस रखी हो।
कोने में पीतल का लोटा था,
मुँह के बल रखा हुआ,
उसकी गर्दन पर सूखे पानी की
एक चमकीली रेखा थी।
खूँटी पर एक धागा था,
उसमें धूप अटकी थी,
और पास पड़ी चौकी पर
एक जगह अब भी गर्म थी।
देहरी पर बैठी हथेली ने
मिट्टी थोड़ा-सा कुरेदा,
नीचे से निकला काँच का टुकड़ा
बादल में चाँद-सा चमका।
जाते-जाते मुट्ठी भर दाने
चौखट पर रख दिए उसने,
कुछ चिड़ियों ने चुन लिए,
कुछ बारिश ने ढक दिए।
फिर पगडंडी पर एक छतरी
धीरे-धीरे धुँध हुई—
इतनी दूर कि लौटना भी
मुमकिन था, जाना भी।
घर देर तक खुला रहा,
किवाड़ ने बंद होना नहीं चुना,
और नीम की एक निचली डाल पर
बारिश देर तक ठहरी रही।
सुबह देहरी पर देखा तो
चावल कुछ कम थे—
किसने चुगे,
कब चुगे—
मिट्टी ने कुछ नहीं कहा।
बस उस रात
खिड़की के पास रखी कुर्सी
बारिश की ओर मुँह किए रही।